गनडाउन

 

सूर्यास्त के बाद
एक पुरानी टूटी हुई पाईप पर
बैठकर वह सोचने लगा
“हाँ, कल ही तो एक धमाके से
जो चिड़िया फूर्र से उड़ गयी थी
जिसका बच्चा पेड़ से गिर कर मर गया था
शायद, उसी दुःख से दुःखी होकर…चिडियाम्मा
उड़ती चली गयी…दूर…बहुत दूर
फिर वापस न लौटकर आने के लिये”
यही सोचते-सोचते
उसने एक श्वेत-तारा पर नज़र टिका दी
और अपने आप से बातें करने लगा,
मैं प्रतिदिन ख़त लिखूंगा…चिडियाम्मा
और तुम्हें आगाह करता रहूँगा…तुम अभी मत आना
यहाँ की हवाएं जहरीली हो चुकी हैं
एक भी चिड़िया इधर से गुजर कर
जीवित नहीं बच सकती
क्योंकि, यहाँ की हवाएं…परों को काटती हैं
यहाँ कोई दुःख नहीं बांटता,
तुम नीड़ का निर्माण कहाँ करोगी
पेड़ की जड़ें बहुत कमजोर हो गयी हैं
यहाँ लोग बे-मौत चौराहे पर मार दिये जाते हैं
धुंए का असर अभी तक कम नहीं हुआ है
दीवारों से खून की छींटे नहीं मिली हैं…आज भी
धामके की अनुगूँज से
प्राण सिहर उठते हैं…अभी मत आना
मैं प्रतिदिन तुम्हें ख़त लिखूंगा…”
उसने पुनः सोचा, “अब कोई चिड़िया
उस सामनेवाले तार पर आकर नहीं बैठती
अब तालाब में हंसों का जोड़ा भी नज़र नहीं आता
जब से वह मोची घायल हो गया है
वह पानवाला अपनी गुमटी नहीं लगता
और न ही वह चायवाला चाय ही बेचता है
जब से उस लड़के का क़त्ल हो गया है
लोग डर गये हैं…धमाका कौन करता है ?
चिडियाम्मा…तुम अभी मत आना…
मैंने संजोकर रखा है…”तुम्हारा सपना…कवि का भविष्य
यह सोच ही रहा था कि अकस्मात्
किसी ने उसे…गनडाउन…कर दिया…
चिड़िया फुर्र से उड़ गयी
और उड़ती चली गयी…
दूर…बहुत दूर…

 

नोट : आज से कई वर्ष पहले जब विद्रोही कवि  ‘गोरख पाण्डेय’ की हत्या हुई थी तब यह कविता  ‘आकाशवाणी जमशेदपुर’ से प्रसारित हुई थी ।

 

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