बूचड़खाना

 

सुबह सात के पहले
जब बच्चे घर से निकलकर स्कूल जाते हैं
पैदल, रिक्शा और अन्य सवारियों से
पीठ पर बैग लटकाये हुए अपने-अपने यूनिफार्म में
वह भी निकल पड़ता है घर से
एक फटी हुई कमीज, घुटने तक पैबंद लगा हुआ हाफ पैंट पहने
हाथों में एक तेज चाकू लेकर
जाफरानी जर्दा के खाली डिब्बे में
चंद पैसों को झनझनाते हुए,
मींचते हुए आँखें, लेता हुआ जम्हाई
और हाथ-पाँव को ड्रिल की मुद्रा में घुमाते हुए
गली-कूचे से होकर
उस झोपड़ी के किनारे-किनारे
जहाँ सारी रात वह बीड़ी सुलगाता रहा…
बस के अड्डे की ओर मुड़ता है
जहाँ स्कूल जानेवाले बच्चे खड़े रहते हैं…क्यू में
वह भी खड़ा हो जाता है चुपचाप
सोचता हुआ, “मैं भी पढना चाहता हूँ…
इन लोगों की तरह मैं भी स्कूल जाना चाहता हूँ
पर, कौन भेजेगा स्कूल…कौन भरेगा फीस…”
और वह खो जाता है स्कूल की दुनिया में…
जहाँ बच्चे सामूहिक-प्रार्थना करते हैं
अपने-अपने क्लास-रूम में जाने से पहले ।

घर्ररररर…बस चल पड़ती है
वह…झांकता है खिड़कियों से बाहर
जैसे कोई कैदी झांकता हो कैदखाने से
उम्रभर की सजा काटते हुए…इस प्रत्याशा में
कि कोई आयेगा…इस कैदखाने की तरफ…इंसाफ के लिये ।
और स्कूल की ओर दौड़ते हुए बच्चों को देखकर
सोचने लगता है (मैं कभी स्कूल नहीं जा सकूँगा)
वह खो जाता है…भेड़ों के समूह में
और हँसता है अपने-आप से बातें करते हुए :
“हाँ, मैं भी तो स्कूल ही जा रहा हूँ…ये बच्चे
जब क्लास-रूम में प्रवेश करेंगे…मैं भी
दाखिल होऊंगा…बूचड़खाना में
जब उनका पाठ्य-क्रम शुरू होगा
मैं भी…बकरे की खाल उतारना सीखूंगा
वे एक दिन पढ़-लिखकर अफ्सर बनेंगे…मैं भी
बड़ा होकर मांस बेचूंगा
अपना बूचड़खाना चलाऊंगा…और नहीं पढूंगा…तो
मेरे बापू मेरी खाल उधेड़ देंगे…कल ही तो मालिक ने
मांस का टुकड़ा नहीं दिया था तो बापू ने पिटाई की थी
माँ शराब नहीं ला सकी तो उसने…
जान से मार डालने की धमकी दी
और मैंने रोटी मांगी तो उसने…पत्थर से मारा
और चीखकर कहा, “मछली मांग…मैं सांप दूंगा…”
आह…उसने मुझको भूखा रखा था उसी तरह
जैसे बच्चे घर में नहीं पड़ते हैं तो उन्हें
खाना नहीं मिलता
उस रात…मांस नहीं मिला तो उसने माँ को…
जानवर की तरह नोंचा था
शराब नहीं मिली…तो केश को पकड़कर जमीन पर घसीटा था
और…आज भी, मालिक ने मांस का टुकड़ा नहीं दिया तो…
यदि…बच्चे नहीं पढ़े तो…फेल
नहीं…उसने सहसा चीखा
और चाकू की मूठ को कसकर दबा दिया

बस…रुकी
और वह उतरकर सीधे…तेज क़दमों से
आगे बढ़ने लगा…बूचड़खाने की ओर
और नाचने लगे उसकी आँखों के सामने
पिछले दिनों का पाठ्य-क्रम
जो सीखा था…कुशल-कसाई से
देखा…बकरे की गर्दन को अलग होते हुए,
कंपित-धड को लकड़ी के स्टैंड पर…टांगकर
खाल उतारते हुए
और उसने सोचा…”मैं पास हो जाऊँगा
घर मांस का टुकड़ा ही नहीं…शराब भी लेकर जाऊँगा
अपने बापू के लिये
ताकि मेरी माँ को दोबारा जमीन पर न घसीटे…”
यही सोचते हुए वह…बूचड़खाना में घुस गया
जैसे बच्चे स्कूल में प्रवेश करते हैं…पढ़ते हैं
सामूहिक-प्रार्थना करते हैं…प्रार्थना…हे प्रभु !

Leave a Reply