प्रकृति की दुर्दशा ………..आहत मन

१. बसता था मन मेरा उसके आँचल में कभी
जो आज उधड़ा सा मानो लगता है
इक विश्वास था उसके अटूट होने में
जो आज झूठा सा लगता है |

२. दिल को छूने वाला तराना था उसके आँचल में
जो आज चुभता हुआ सा मानो लगता है
इक विश्वास था उसके अटूट होने में
जो आज झूठा सा लगता है |

३. सब ऋतुएँ समेटे इक शीतल सा एहसास था उसके आँचल में
अब बारह मॉस जेठ की तपिश सा जलता मानो लगता है
इक विश्वास था उसके अटूट होने में
जो आज झूठा सा लगता है |

४. क्या जीव क्या जंतु , क्या कीट पतंगा
सबका सरमाया था उसके आँचल में कभी
अब तो सिर्फ़ इंसानों का डेरा लगता है
बसता था मन मेरा उसके आँचल में कभी…….जो आज झूठा सा मानो लगता है |