घरौंदा

घरौंदा….

जहाँ तक मेरी दृष्टि जाती है
उससे आगे भी (कहाँ तक मालूम नहीं)
नज़र आती हो तुम
कभी ओस की बूंद बनकर
कभी जाड़े की मीठी धूप बनकर
कभी पूरनमासी की स्निग्ध-चांदनी बनकर
मेरे ख़्वाबों की जमीन पर उतर आती हो तुम
जहाँ तक मेरी दृष्टि जाती है
उससे आगे भी (कहाँ तक मालूम नहीं)
नज़र आती हो तुम
सुना है, एक तिहाई पृथ्वी जलमग्न है
उसी तरह मेरा जीवन भी तेरे प्यार से अभिषिक्त है, प्रिये !
और शेष भू-भाग पर
मैंने एक घरौंदा बनाया है….तुम चाहो तो उसे
पृथ्वी का स्वर्ग कह लो
क्योंकि मैंने देखा है गौरैयों को
तृण-पात चुन-चुनकर घोंसला बनाते हुए
सृष्टि रचाते हुए मनु दसवें की तरह तो मैंने पूछा, “ये सब क्या है”,
और वह गंतव्य की ओर फुर्र से उड़ते हुए….
कह गयी हो जैसे मंत्रवत्….प्यार
और मैं अपलक उसे देखता रहा (कहाँ तक मालूम नहीं)
पर जहाँ तक मेरी दृष्टि जाती है….उससे आगे भी
तुम चाहो तो उसे….अनंत कह लो
मैंने एक घरौंदा बनाया है – तुम चाहो तो
पृथ्वी का स्वर्ग….कह लो

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