रातभर आँखों में नींद न थी

ग़ज़ल…

रातभर आँखों में नींद न थी
हमको उनसे ये उम्मीद न थी

पूछो न हालत क्या थी हमारी
बचने की कोई तरकीब न थी

हम थे मुश्ताक़ ऐ दिल, वर्ना
उनकी नीयत कुछ ठीक न थी

मरने को तो मर जाते लेकिन
वो वफ़ा की तस्वीर न थी

दावा करते भी किस तरह कहिये
मोहब्बत की कोई रसीद न थी

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