एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते ? / फ़राज़

एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते ?
मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते ?

मोती हूँ तो दामन में पिरो लो मुझे अपने,
आँसू हूँ तो पलकों से गिरा क्यूँ नहीं देते ?

साया हूँ तो साथ ना रखने कि वज़ह क्या ‘फ़राज़’,
पत्थर हूँ तो रास्ते से हटा क्यूँ नहीं देते ?

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