रुक जाओ तुम आज यहीं

ग़ज़ल…

रुक जाओ तुम आज यहीं रात बहुत गहरी है
अभी-अभी धमाके की आवाज उभर कर ठहरी है

न जाने कब कौन यहाँ, छिपकर हमला कर बैठे
आज की रात शहर की सूरत कातिल बनकर उभरी है

घायल होकर पड़े हैं लोग चौराहे-पे इधर-उधर
बे-मौत मरे हैं ग्रामीण जो बचकर निकले शहरी हैं

जाने की मत जिद्द करो, रुक जाओ हाँ, रुक जाओ
बे-गुनाहों के सीने पे छुरियाँ अक्सर उतरी हैं

आज की रात कट जाये तो कल की सुबह देखेंगे
थोड़ी-थोड़ी हालत अभी कुछ देर की खातिर सँवरी है

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