जान पे जो खेल के, हमको ये वतन दिये

ग़ज़ल….

जान पे जो खेल के, हमको ये वतन दिये
निभा सकें न हम कभी, उनको जो वचन दिये

हम क्या दिये क्या लिये, पूछें अपने-आप से
एक वो शहीद जो आज़ाद कर चमन दिये

आज भी बेचैन है, रूह उनकी ऐ वतन !
जब-तलक थे प्राण, जी-जान से जतन किये

पूछ्तें हैं बार-बार, आ के मेरे ख्वाब में
क्यूँ अंकुरित हुआ नहीं जो बीज थे वपन किये

सुन के अनसुना किये उनकी दास्तान हम
उनके जज्बे-वतन को दिल में ही दफन किये

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