हाँ, रोने-धोने से क्या होगा

 

कण-कण में ईश्वर का स्पंदन
उसकी हँसी, उसी का क्रंदन
तन मिट्टी, आत्मा है चन्दन
बिष ब्याल का न व्याप्त होगा
हाँ, रोने-धोने से क्या होगा

अपना जब छूट जाता है
सपना तब टूट जाता है
संचित-धन लूट जाता है
तो क्या हुआ, फिर…फिर होगा
हाँ, रोने-धोने से क्या होगा

जग में दीन-हीन वही है
मुर्ख और प्रज्ञाहीन वही है
पास हीरा, ढूँढता कहीं है
ऐसा जीवन भी क्या होगा
हाँ, रोने-धोने से क्या होगा ‍

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