रिक्तता प्रार्थना से भरेगी

 

अपने अंतर के सुनेपन को
और प्रिय तुम गहराने दो
जो होना है, हो जाने दो
हाँ, होनी तो होकर रहेगी
रिक्तता प्रार्थना से भरेगी

धुएँ से भरना छलना है
सत् का रूप आवृत्त करना है
व्यर्थ रंगों से चित्र भरना है
स्वयं आकृति उभर कर रहेगी
रिक्तता प्रार्थना से भरेगी

जो है उसे वैसा ही जानो
आकाश हृदय का, पहचानो
सत् को मानो या न मानो
किरण उसकी झर कर रहेगी
रिक्तता प्रार्थना से भरेगी

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