कैसा हाहाकार है?

ये कैसा है कोलाहल कैसा हां-हाकार है ।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

निहित स्वार्थ वश हिंसा बढ़ती। बहकावे में जनता मरती ।

खून की नदियाँ यहाँ उफनती। मन में संकीर्णता पनपती।

मर्यादा के ऊपर कुर्सीराग का बज्र प्रहार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

कोई खाली पेट तड़पता। दो रोटी के लिए झगड़ता ।

बड़े पेट से दबकर मरता। घुट-घुट करके प्राण निकलता।

शोषक डंडीमार पनपता बढ़ता धन भंडार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

गिरता है शिक्षा का स्तर। तुष्टीकरण बनाता बदतर।

सुलग उठा है शिक्षा परिसर। राजनीत छात्रों के सर पर।

मेधा कुंठित होती अब तो ज्ञान दान व्यापार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

आरक्षी बल स्वयं अरक्षित। अपराधी खादी संरक्षित।

भुला दिए सब जनता के हित। घटनाएँ बढ़ चली अपरमित।

मुल्जिमान को खुली हवा सज्जन को कारागार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

कैसा भी हो काम कराना। जीते को चाहे हरवाना।

मरे को भी जिंदा करवाना। दफ्तर बैंक कचहरी थाना।

काले धन के स्रोत उजागर घूसखोर व्यवहार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

कहने को तो अभी बहुत है। अपनी भी तो बुरी नियत है।

विजय वरन कर रहा असत है। इनमें उनकी कहाँ बकत है।

निंदक नियरे नहीं चाटुकारों को मिलता प्यार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

Devesh Shastri

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  1. aahuti 27/01/2013

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