खुद से कह लो पीर

जैसी है करनी रही वैसा फल का स्वाद

सदकर्मों के गुणों की भी होती है म्याद

सुख जाने पर दुखों का निश्चित है आरम्भ

क्षणिक सफलता पर अहो क्यों है इतना दंभ

दम्भित सम्पाती उडा पाने को मार्तंड

जरे पंख व्याकुल गिरा अपनाया भूखंड

उधर जटायू साधु मन दंभ रहित हरिदास

परहित पंख कटाय के पावा प्रभु-आवास

जरे-कटे निरपक्ष भै दोनों भाई गिद्ध

दुखद सुखद तन पीर को सहज करिगाये सिद्ध

शिवि बन तन कर्तन करें मन मत होय अधीर

अंत: ब्रह्म निवास है खुद से कह लो पीर

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