नक़ल

खुली नक़ल से देखिये, ढेरों पाये अंक।

अंकपत्र पा खुश हुए बुद्धि शून्य मन रंक॥

बुद्धिशून्य मन रंक, डंक सा मारे जग सब,

खडे निरुत्तर पूछे जाते यहाँ प्रश्न जब,

नजर चुराते दिखे चोर सम वही विकल से।

लूटे जिसने अंक भयंकर खुली नक़ल से॥

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