शेर ४- असर लखनवी

(1)
खुद ही सरशारे – मये- उल्फत1 नहीं होना ‘असर’,
इससे भर-भर कर दिलों के जाम छलकाना भी है।

(2)
खुद मेरी जौके-असीरी2 ने मुझे रखा असीर3,
उसने तो कैदे-मुहब्बत से किया आजाद भी।

(3)
खूगरे – दर्द4 हो अगर इन्सां,
रंज में भी मजा है राहत का।

(4)
खूने- हजार – हसरतो – अरमाँ के बावजूद,
उसकी नजर में हम न समाये तो क्या करें?

(5)
खूबिए-नाज5 तो देखो कि उसी ने न सुना,
जिसने अफसाना बनाया मेरे आफसाने को।

1.सरशारे-मये-उल्फत – मोहब्बत की मदिरा से लबालब या परिपूर्ण 2.जौके-असीरी – कैद होने या क़ैद में रहने का शौक 3.असीर – कैदी 4.खूगरे– दर्द – गम सहने का आदी 5खूबिए-नाज – नाजो-अदा या अभिमान की खूबी

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