मैं लाचार हूँ , मेरी आत्मा मर चुकी है

मैं लाचार हूँ , मेरी आत्मा मर चुकी है |
१. मुझसे क्या कहते हो
क्या मैं तुम्हें या
तुम मुझे जानते हो ?
..हाँ जानता हूँ |
क्या ! क्या कहा ! कैसे ?
..इंसानियत के नाते
मदद करो |
पर मैं लाचार हूँ, मेरी आत्मा मर चुकी है |
२. सामाजिक,मानवीय मूल्यों की परम्परा भूल
आत्मोसर्ग से विमुख
न जाने किस पथ किस रथ पर
चल पड़ा हूँ इस
नए दौर में |
पहले तो ना था ऐसा
जो बन बैठा
वर्तमान,आधुनिक कहने वाले
समाज की अंधी दौड़ में
आज |
३. माँ ने तो न था सिखलाया
गुरुओं ने भी नेकी का पाठ पढ़ाया
पर जब से हूँ इस दौड़ में आया
अंत:मन में यही पाया
मैं लाचार हूँ, मेरी आत्मा मर चुकी है |
ये कैसी है दुविधा
कशमकश में हूँ
क्या समय ने
या
मैंने है खुद को लाचार बनाया ?

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