“अभी सांसे शेष हैं”

अन्दर के अंधेरो से होकर,

आती है कुछ किरणे;
मेरे घर के आँगन में |

प्रकाशमय लकीरें खिच जाती ,
भीतर के शुन्य तिमिर में |
पर हम उससे अनभिज्ञ
सोए अपने स्वप्न भवन में |
पर किरणों ने स्वप्नों में भी
दिव्य ज्योति दिखलाया ,
माथे पर हाथों को रखकर
उसने हमें जगाया |
पर हम नींद में इतने मस्त रहे ,
कुछ पता नहीं चल पाया |
कौन आया कैसे छूकर ,
किसने हमें जगाया |
जब नींद टूटी तो लौट चली थीं
हो निराश वह किरणे ,
पर नींद न थी आँखों में
जो सो जाते स्वप्न भवन में |
अब जब पड़ी जरूरत तो
हम भागे उसके पीछे ,
था अपने किस्मत को कुचल दिया
अपने पैरों के नीचे |
आँगन के दीवारों से होकर के
किरणे उतर चुकी थी ,
तम की परछाई से  घिरकर
रेखाएं बिखर चुकी थी |
अब हम खुद पर रोते
और कोसते रहे किस्मत को ,
नहीं पहचान पाए
उस महान शक्ति को |
                            पर अभी भी वक़्त है ,
                            अभी सांसें शेष हैं ,
                            आओ कर लें उसको याद |
                            दोनों हाथों को जोड़कर
                            पूरी कर लें फ़रियाद ||

One Response

  1. http://www.erules.org 25/06/2012

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