तबादला

बहुत दिनों बाद आश्चर्य में घिरते
फिर से लौटना उसी शहर में
बस की चैकोर खिड़की में नहीं समाती नई नई इमारतें
कल तक खाली पड़े मैदान में
विशाल कुकुरमुत्ते की तरह एकाएक उग आई नुमाइश
सगे-संबंधियों के जल्दी से न पहचाने जा सकने वाले चेहरे

कैसी विडम्बना है कि हर बार भूल जाते हैं
हम अपने ही घर का मार्ग

कितनी तेजी से बदल जाती है दुनिया
व्यथा और आश्चर्य में डूब कर मैं कहना चाहूँगा
हर बार, हर किसी से, और हो सकता है
किसी से भी कह न पाऊँ

हो सकता है शहर की भीड़-भाड़ से घबरा कर मैं
पकड़ लूँ पहली रेल और कहीं और चला जाऊँ

पर सड़क से गुजरते हुए यह भी हो सकता है
नज़र आ जाए हमें किसी पुराने दोस्त का घर
जो जरा भी न बदला हो इस बीच
हू-ब-हू वैसी ही हो जिसका रंगत
दृश्यों के बीच वैसा ही हो जिसके होने का अहसास
तो संभव है एकाएक मैं भूल जाऊँ
कि मैं किस जरूरी काम से सचिवालय जा रहा था
और ठिठक कर खड़ा रहूँ कुछ देर वहीं

कुछ पल खुश हो लूँ यह खोज कर
कि क्रूरता और आपाधापी से भरी तेज़ रतार दुनिया में
अब भी अवशेष है कुछ ऐसा
जो पवित्र और अनबदला है हमारे बचपन के दिनों-सा
और जिसके सहारे
हम शहर में छुट्टियों के चंद कठिन दिन काट सकते ह

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