आँसू

साहित्यिक मूल्यों की दृष्टि से आँसुओं में छिपा रहता है
अक्सर किसी अधलिखी कविता या कहानी का अंश
जीवविज्ञान के अनुसार वे हमारी प्रजाति का विशेषाधिकार हैं
ख़ास तौर पर मनुष्य को नष्ट होने से बचाने में उनकी उपयोगिता असंदिग्ध है
यद्यपि मनोविज्ञान की दूसरी शर्त यह है कि उन्हें वास्तविक ही होना चाहिए

यदि तुम पानी में ज़रा-सा ख़ार और नमक मिला दो और उसे जीभ की नोंक से छुओ
तुम पाओगे आत्मा की व्यथा के सच्चे प्रतीक का अद्वितीय घोल तैयार है
आँसुओं को चाहिए सदैव एक असहनीय दुःख
जो इस जीवन के लिए एक मामूली-सी घटना भर है
यह बात अलग है आँसू झूठ और सच का भेद धो डालते हैं
और नीतिशास्त्र के लिए ऐसे अन्तर का भी अपना एक महत्व है

पर बच्चों और कवियों के आँसुओं की तो बात ही कुछ निराली है
जिसे बेबेसी और निश्छलता और पवित्रता और मासूमियत
और ईश्वर आदि-आदि पर लिखे गये किसी साहित्य में
ठीक-ठीक तरह शायद आज तक
व्यक्त नहीं किया जा सका है !

Leave a Reply