रात

यह कोई दूसरा नक्षत्र ही है बहुत सारे प्रयोजनों के लिए
प्रकाश में हम जिस दुनिया से परिचित थे
वह तो पश्चिम के सूर्यास्त पर ही बुझ गयी

तुम्हारे भीतर इच्छाओं ने अपनी नींद तोड़ी
और अनजाने रंग झिलमिलाने लगे

रात भी इस बात को समझती है कि हर बार उस के
काले जादू में पृथ्वी का सिर्फ़ आधा हिस्सा ही डूबता है,
पर यह कोई उल्लेखनीय सूचना नहीं
तर्क और विवेक के विद्रोह के बावजूद मैं इसे शब्द में समझना चाहूँगा

कैसे चढ़ता है जूड़ी-बुख़ार और तारीख़ की काया बदल कर राख हो जाती है
आँख खुलने पर भी लगता है कोई सिरहाने खड़ा है
क्या वे पेड़ हैं-पेड़ ?
जो बादलों की तरह शक्लें बदल रहे हैं
आँखों में भरे रेडियम के अंगारों के सहारे शायद कोई बिल्ली मुँडेर पर चल रही है
हर आहट को सुन रही है सड़क
गली में शराब पी कर लौट रहे आदमी के पदचिन्ह छप गये हैं

बच्चे अपने प्रारम्भिक सपनों में सिर्फ़ रोशनी, घास और मैदान देखते हैं
टपक रहा है खम्भों से पीला जलरंग
नींद जाग रही है ध्वनियाँ ख़ुद को सुन रही हैं स्पर्श अपने-आपको छू रहे हैं
पानी को प्यास लग रही है

भौंकते हुए कुत्तें का रुदन चन्द्रमा से बह कर आ रहा है
बिस्तरों के गुरुत्वाकर्षण ने थकी हुई स्त्रियों को खींच लिया है

कुछ ही घंटों में कितना बदल जाता है चिन्ताओं का केन्द्र
सिर्फ़ जानते हैं तकिये घर के
रात की सैर को रात के समुद्र की तरफ़ जाते हुए
आज तक मैं रात को कभी नहीं समझ पाया
और सचमुच इस बात का मुझे कोई मलाल नहीं है
इस रात भी।

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  1. Hemant Shesh 15/07/2012

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