किसी और दिन के लिए

इस वक्त जैसा भी जो कुछ भी मेरे पास है और
नहीं है उसी से शुरू करूँगा मैं
कि यह है एक रात और दो बज चुके हैं
क़ायदे से अब तक नींद में होना चाहिए था
मुझे और मैं किसी घटना के लिए जाग रहा हूँ

क्या कर सकता है एक कवि भला इस संसार में ?
प्रेम या घृणा, क्या नहीं कर सकता है वह कविता में ?
हाँ, यह रात है, और रातों ही जैसी, और
इसे रात ही कहा जाना चाहिए, हर भाषा में बेंत की खाली
कुर्सियाँ, धूल फाँकती रोशनी, उदासी
जिसक कन्धे छिल गए हैं, एक प्रतीक्षा में, वे दिन पता नहीं कहाँ हैं ?
मुझे अपने लिए अपनी भाषा में किसी
चमत्कार की जरूरत नहीं।
नहीं है ‘लोग क्या कहेंगे’ वाला डर भी
इस पल में सिर्फ़ हूँ और मेरा होना। उसी
होने के आखि़री सिरे पर रात के दो बज रहे हैं
करवट बदल रही है मेरी भीतर रेतघड़ी

एक रेल गुज़र रही है कहीं पहुँचने या न पहुँचने के लिए
फिर रात
क्या तुम एक सपना हो,
तुम एक भ्रम हो सकती हो, एक यथार्थ भी
क्यों अब तक मैंने प्रेम नहीं किया अपने-आपसे ?
आपको क्या यह भयानक बात नहीं लगती ?

दूसरों के लिए ही हैं सारे दुःख और प्रसन्नताएँ
छुटकारा नहीं मिलने वाला
पिघलते हुए अख़बार, जमते हुए परदे,
बहते हुए मच्छर, फटते हुए मूर्तिशिल्प
पढ़ा जा चुका दूध, और भिनभिनाती हवा,
देखना

किसी दिन मैं
इन सबको भूल जाऊँगा !

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