कहाँ है लालटेन

यह कौन सा दिन है मेरे भीतर झिलमिलाता हुआ ?
क्या यह एक प्रतीक्षा है किसी प्रेम के अँधेरे की,
जिसमें तुम एक उजाले की शक्ल में दिखती हो, स्मृति ?
बीते हुए कुछ मौसमों और भविष्य के काठ को छीलता हुआ समय
हमारी इच्छाओं का काल है।
एक बहुत लम्बा कछार, जिसमें बदलती हुई सूरतों के दरख्त हिलते हैं।
पराजय, घास नहीं हो सकती।
न वह पत्ता, जो मन के कुंड में किसी अपरिचित वर्तमान से झरता हो
धुन्ध लगातार उड़ती है और बादल पानी के बोझ से फट कर बरसते हैं।
कत्थई दिशाओं को इन्तजार का सरोंता काटता है।
रेत के अंतिम छोर पर हिलता है गहरा केसरिया रंग।
निश्चय ही वहाँ बुझते हुए जुगनुओं के दिये टिमटिमाते होंगे।
पवित्रता एक शब्द ही है देह के सागर की कोई अनन्त तरंग।
स्पर्शों के भीतर चले जाते हैं कुछ बेचैन और उदास वार।
सुलता है एकान्त। उड़ कर जाती हुई चिडि़या की पीली चहचहाहट।
पानी उलीचती हुई नाव हरे कच्चे सिंघाड़ों के तालाब को काटती है।
बार-बार चिट्ठियों की बाट जोहना। शुभकामनाओं के वाक्य।
रसीला और कुछ आर्द्र बहता रहता है हमारे भीतर।
स्वाद के किनारे वह जो खड़ा है- स्तब्ध, जिज्ञासा जैसा,
उसी से हमें शुरू करना होता है अपना जीवन,
कष्ट कहाँ नहीं है ?
शब्द में जो बहुत कुछ अनकहा है, किसी पहाड़-सा,
उसी के हाथों में सोंप
कर मे अपना ‘होना’ तुम्हारी तरफ़ चलता दिखता हूँ ख़ुद को
तारीखे़ और वर्ष आँधी में उथल-पुथल होते जाते हैं। कौन बतायेगा
लालटेन किधर रखी है ? आखि़र यह क्या है ? क्या ? जिसे सुविधा
के लिए हम समय का नाम देना सीखते हैं
अपने लिए बचाये गये जीवन में,
अगर अँधेरे के भेस में वह एक रोशनी है।

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