लालटेन

लालटेन-1

वह, जो डबडबा गया है भीतर बुझती रोशनी का आलोक,
चाहेंगे हम तत्क्षण उसे किसी बचाये हुए काव्यार्थ से जोड़ना

तारीख़ों का मतलब क्या है घडि़यों की सभ्यता में ?
वे उड़ती आ रही हैं
किसी अतीन्द्रिय ऊँचाई से बेमतलब,
सारी उकताहटों का, चिन्ताओं का काल एक है

ध्वंस और अँधेरे से भरी रात में
कोई लालटेन ज़रूर है हमारे अन्दर
ज़रूरत पड़ने पर जिसे हर सम्भ्रम में
कविता के चकमक से जलाया जा सकता है।

लालटेन-2

दूर से जलते हुए केसरिया धब्बे की तरह दिपती थी वह
अगणित थे उसके होने के मायने
पिघलती हुई आर्द्र रोशनी में पास-पास बैठना
और दीवार पर देर रात तक काँपती हुई परछाइयों को ताकते रहना
उसी के जलने से शुरू होती थी रोमांचक कि़स्से-कहानियों की रात
सुख-दुःख की घडि़याँ
वह दिखाती थी सिर्फ़ हाथ भर दूर की चीज़ें
पर जीवन भर लोग उस पर बेपनाह भरोसा करते थे

ऐसा नहीं कि अब दुनिया में लालटेनों का चलन नहीं है,
पर खेद!
लालटेन की आकृति में हमारी भीतर बुझ गयी है जिस आत्मीयता की लौ,
सिर्फ़ किसी पछतावे से फिर नहीं जलाया जा सकता उसे।

Leave a Reply