प्रवास-काठियावाड

झुर्रियों से भरती काली धरती।
लम्बा होता क़द दोपहर का।
बढ़ने की जल्दी नहीं है अगर किसी को
तो वे बस पेड़ हैं-
जो अपने-आपको झाड़ी बन जाने से बचा रहे हैं।
चर रही हैं अदृश्य गायें अदृश्य घास।
अदृश्य बच्चे फेंक रहे हैं, अदृश्य पत्थर, अदृश्य फलों की तरफ़।
एक अदृश्य ताल से अदृश्य औरतें अदृश्य पानी ला रही हैं
चार साल से झेल रही है कुछ इसी तरह
काठियावाड़ की काया
इन्द्र के हंटर की मार
पर ‘डाँडिया’ के लिए उसकी आज्ञा लेने की ज़रूरत नहीं।
जब-जब भूलूँगा-काठियावाड़
आयेगी याद पगडंडी पर चली एक पैदल चितवन
खेत जोतता रंगों से भरा एक साफ़ा
चिलचिलाती मई
पेड़, सूखा ताल और कच्चे आँगनों में सूखतीं अचार के लिए
सुर्ख़ लाल मिर्चें।

Leave a Reply