माँ

दुर्गम पहाड़ों के परे अबाध झरनों के पार
बीहड़ जंगलों के आखिरी किनारे पर
अकेली रहती है जो स्त्री
वही शायद हम सब की माँ है

बहुत दफ़ा हम बहुत-सी चीज़ों को नहीं जानते
हम ये भी नहीं जानते माँएँ अपने बच्चों के लिए
क्यों प्रार्थनाएँ करती हैं
क्यों रखती हैं वे आए दिन व्रत उपवास मन्नतें माँगती हैं

निर्जन वन में बिल्कुल अकेले रहते हुए भी
कातती हैं दिन-रात वे हमारे लिए संस्कारों का सूत

ये कपड़े जो हम लोगों ने पहन रखे हैं
और जिन्हें पहन कर हम आज इतना इतरा रहे हैं
माँ के काते सूत से ही बने हैं
हमने अर्से से उसे नहीं देखा
सिर्फ़ उसके बनाए वस्त्र पहने हैं और उसकी दी हुई भाषा बोली है

सदियों से सोच रहे हैं हम
अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए
किसी दिन माँ से मिलने दुर्गम पहाड़ों से परे
अबाध झरनों के पार बीहड़ जंगल के आखिरी छोर तक जाएँ

तभी से सामने हैं
दो मामूली, किंतु अनुत्तरित सवाल-
अपने ‘होने’ की कृतज्ञता के लिए बोलें माँ से किन शब्दों में ?
उसके लिए आखिर कौन-सी चीज़ ले जाएँ ?

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