नींद

समय जैसा वह कुछ भी नहीं था जिसे बीतना पड़ता
जिन शरीरों के भीतर से दोपहर को गुज़रना पड़ा
कदाचित् वे भी हमारे न थे
दूर सम्भवतः सिर्फ़ छायाएँ हिलती थीं लाचार और निस्तेज
भ्रम होता था जैसे कोई हमारी शिराएँ काट रहा हो
उजाले की गर्माहट से पैदा नहीं हो सकती थी कोई भी हलचल
न ही अन्धकार निस्पन्द कर सकता था किसी को
किसी भी मज़ाक़ पर हँसी नहीं आती थी
और कोई फि़क्र उदासी नहीं जगा पाता था

दिशाएँ सिर्फ़ आभास भर थीं और
शुरू-शुरू में सिर्फ़ ऐसा लगा
जैसे आप किसी पुराने तालाब में नाक बन्द करके गोता लगाते हों
पानी न ठंडा था, न गर्म
(आश्चर्य वह गुनगुना भी न था)

होने की स्मृति सिर्फ़ कुछ ही पल साथ रही अगर उसे स्मृति कह सकें
सिर्फ़ कुछ रंगों ने चाहा धब्बों में बदल जाने से पहले
वे साफ़-साफ़ए पहचाने जायें
सिर कटी आवाजे किसी कुएँ के भीतर से आने लगीं
जैसे धुन्ध ने उन्हें अपने में लपेट लिया हो
फिर चलती हुई बेआवाज़ फि़ल्म जैसी कोई चीज़ कब
एकाएक टूट गयी कोई नहीं कह सकता

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