सवेरे की चाय

आज तीन मई उन्नीस सौ अठ्यासी है मंगलवार
गर्मी के दिन हैं पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया
और घड़ी में छः बजा चाहते हैं
अब हमारी प्रातःकालीन सभा शुरू होती है

कहीं पास ही बज रही है आकाशवाणी
घड़ी मिला रहे होंगे कुछ समयपाबन्द लोग
संभव है कुछ मेरे जैसे अलसाए हुए बिस्तर में हों

सड़क के अदृश्य मोड़ से निकल कर आ रहा है एक परिचित कुत्ता
जिसके बालों का रंग सड़क के कोलतार से भी काला और दर्शनीय है

अख़बार का इन्तज़ार हमारी दिनचर्या का पहला चरण है
अगले कुछ मिनट हम उसी कार्य को करेंगे

मैं जानता हूँ आधा विश्व गुसलखानों में होगा आधा टूथपेस्ट की टयूब में
किन्तु खिड़की में फँसी बिना सजी सँवरी फैशनेबल औरतें दयनीय लग रही हैं
मृत्यु-भय से सैर के बाद लौट रहा है 50 से ऊपर के अधेड़ों का दल
बसें खाँसने लगी हैं नींद से उठकर एकाएक और
चार रिक्शे मोड़ के स्टैंड पर सवारियों की बाट जोह रहे हैं
छः सैंतीस पर छूटती है लुहारु-सवाईमाधोपुर पैसेन्जर
और आपको जल्दी न हो तो यहाँ से स्टेशन का किराया
सिर्फ़ ढाई रुपये है
ब्राह्म मुहूर्त में सक्रिय हैं शहर भर की चिडि़याँ

मुझे गर्व है रोनाल्ड रीगन और मिखाइल गोर्बाचोव
दोनों मिल कर भी नष्ट नहीं कर पाए हैं
सवेरे की चाय का मेरा कप महकता हुआ धुँआ
उसमें से उठ रहा है
हर सुबह की तरह

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