आँधी

आँधी एक शब्द ही नहीं हादसा है
किसी प्रकोप किसी अतीत किसी महीने की पौध हमारे भीतर उगाती हुई
यह घडि़यों से गायब कर देती है वक्त
थरथराती हुई धमनियों में उतार देती है
सन्नाटे का भयानक और आकर्षक पीला रंग
पल भर में बदल जाती है चहकती हुई वस्तुओं की आत्मा
और हर चीज़ अपना आधार खोती जान पड़ती है
आसमान से निचुड़ कर गिरने लगता है सर्वव्याप्त नीला अंधकार
अक्सर पूर्वाभास हो जाता है मवेशियों और पक्षियों को आँधी का
भयत्रस्त दिखलाई पड़ती है घोंसले में दुबकी हुई गौरैया

न जाने किस बढ़ई के हाथ से छूटा हुआ एक रन्दा है
जो अपने आसपास को छीलता है
एक क्रुद्ध हाथ है
क्षण भर में ध्वस्त कर डालता है जो मनुष्य की निर्मितयाँ
मकानों के टीन-टप्पर
बैठकों की सजावट चैकों के बर्तन-भाँडे

मुँह में भरी हुई बेस्वाद किरकिराहट
और गश्त लगाती धूल का एक ताण्डव है यह
समापन पर जिसके अख़बारनवीसों को अचानक दिखलाई देने लगते हैं
टेलीफ़ोन के मुड़े हुए खम्भे पछाड़ खाकर सड़कों पर धराशाई पड़े पेड़
और बिजली के टूटे हुए तार

किसी डरावनी फिल्म की तरह शुरू हो जाती है आँधी
मुखपृष्ठ की पहली ख़बर बनते हुए

अन्त में रह जाती है वहाँ
अतीत को वर्तमान और वर्तमान को भविष्य से जोड़ने की
एक कष्टदायक कार्यवाही

वह जगाती है हमारे भीतर न जाने कैसे-कैसे ज़माने

‘‘पत्थर तक उड़ने लगते थे, सन् चालीस की आँधी में’’
शायद कहते हों अब भी कुछ पुराने लोग

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