अज्ञातवास से लौट कर

अपने हर अज्ञातवास पर
हम थे पहाड़ जैसे निष्कंप किंतु भीतर से ओस जैसे आर्द्र
खेद और प्रतीक्षा में निकल रहे थे वर्ष
वस्तुएँ बरस रही थीं बेरहमी से राहगीरों पर
बचाव में सिर्फ रह गई थीं मंगलकामनाएं घर के चूल्हों में
बहनों के निकट भाइयों के लौटने का इन्तजार था
बुने हुए स्वेटर जैसा

इस बीच पता नहीं वे कब लौटे
राहगीरों का क्या हुआ
जब पूरी हुई अज्ञातवास की अवधि
और हम वापस आए संसार में
चूल्हों और राहगीरों
बहनों और स्वेटरों को
हम ने लगभग वैसा ही चिन्ताग्रस्त देखा।

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