जैसलमेर

रेत

एक दृश्य था असमाप्त
उचाट निस्संग आकाश
और बाँझ पृथ्वी के बीच टँगा हुआ

किवाड़ भेडें और गोबर लिपे आँगन
सवेरे से टीलों के बीच उबल रहे थे
खेजड़ी के बचे-खुछे पत्तों को पीलिया था और
दसों दिशाओं को रतौंधी

देखा तभी मैंने
मिट्टी के चूल्हों पर मीलों लम्बी लू को खौलते
वह लताड़ की तरह पड़ रही थी
उड़ते हुए अंगारों के बीच से रास्ता बनाता
एक ऊँट सवार न जाने किस दिशा में जा रहा था
एक पैदल स्त्री सिर्फ एक मटका पानी की तजबीज में
तीन कोस दूर से चल कर
डेढ़ सौ हाथ गहरे कुएँ तक आ रही थी

ठिठका मैं यकायक
अचंभे की तरह लगने लगी सारी सृष्टि
दारुण दुःख और लाचारी के लहूलुहान रंग चारों तरफ उड़ने लगे
मिट्टी जैसे दिखने लगे ऊँटों के काफिले
और मटकों में तब्दील हो गईं पैदल चलती स्त्रियाँ
अभ्यस्त हो गए साफे पगडि़याँ
ओढ़नियाँ घाघरे अँगरखे और गोरबन्द लताड़ों के

फिर लोगों ने सहजता से कहाः
पहले भी कटा है आगे भी ऐसे ही कट जाएगा यह जीवन
दोस्त तुम अपनी राह लो

. . . और दोस्त वहाँ से चुपचाप
खिसक आया दृश्य की तरफ पीठ करके
अपनी बिल्कुल भिन्न दुनिया में
किन्तु
कमायचे ’ पर बजती एक लोक धुन
और
चूल्हों की बुझी हुई राख का रंग
बरसों बाद आज भी उस का पीछा नहीं छोड़ता

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’ पश्चिमी राजस्थान का लोकबाद्य

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