जो कविता नहीं कहती

कविता कहती है सिर्फ तीन दिन बाद लोग बदल जाएँगे
पत्नियों को बेइन्तहा प्यार करने वाले और
बच्चों की इच्छाओं के लिए समर्पित
शाम को अच्छे कपड़े पहन कर बगीचे में घूमने वाले
दुकानदारों द्वारा लौटाई गई रेज़गारी को न गिनने वाले
यहाँ वहाँ थूक देने की आदतों से सख़्त ऐतराज करने वाले
बाज़ार से बिना खरीदे भी खुश दीखने वाले
रेस्त्राओं में दोस्तों को काफी पिला कर प्रसन्नतापूर्वक बिल चुकाने वाले

कविता कहती है सिर्फ़ तीन दिन बाद
लोग रोटियों को स्वाद लेकर खाएँगे
अच्छी सब्ज़ी की तारीफ़ करेंगे
महिलाओं के लिए बस की सीट छोड़ देंगे
बूढ़ों को हाथ पकड़ कर रास्ता पार कराएँगे
अपरिचितों से भी मिलेंगे मुस्करा कर
और विदा में नम्रतापूर्वक जोड़ देंगे हाथ
अतिथियों के आगमन पर खुश होंगे
अपनी छोटी-छोटी पराजयों पर रोएँगे नहीं लोग
केवल तीन दिन बाद
कविता कहती है

वे तीन दिन तीन रातों के बाद आएँगे

वे तीन रातें कब आएँगी, पृथ्वी पर लोगों तक
कविता नहीं कह सकती !

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