जुलाई में मल्लाह

समुद्र खदक रहे हैं किसी देगची में
वे जहाज़ अब तक नहीं लौटे
जिन पर सवार थे वज्र जैसी बाँहों वाले मल्लाह
जिन के भीतर एक बच्चे की किलकारियाँ थीं
एक पत्नी की फ़र्माइशें
एक दोस्त की शुभकामनाएँ
एक पिता के आशीर्वाद

समुद्रों के झाग बदल देते हैं दिनमान
और जुलाई के आकाश में पुती रहती है
अक्सर तूफ़ान की आशंका
जिसे दुनिया की तमाम वस्तुओं के उपसंहार तक पहुँचना है एक दिन
मल्लाह जानते हैं अदृश्य में सूत कातते हुए
बहुत सी तकलियाँ लोगों के पेट में घूमती हैं
हर मनुष्य को छोड़ देना होता है बिस्तर
और समेट कर अपने जाल असबाब
निकलना पड़ता है समुद्र में टूटी हुई नाव पर सवार

कभी-कभी महीनों बाद उन्हें दिखलाई देती हैं अवाबीलें
बरसों बाद पेड़ दशाब्दियों बाद शहर के संकेत
सदियों बाद उस स्वर्ग की दिव्य रोशनियाँ
जो घर की खिड़की पर आकाशदीप की शक्ल में जलती हैं

बंदरगाहों में जब छटपटा रही होंगी नौकाएँ
मरती हुई मछलियों की तरह और सागर से
उफन कर बाहर आ रहा होगा नमक
मल्लाहों की स्मृति में चमकने लगेंगे किलकारियों, फर्माइशों,
शुभकामनाओं और आशीर्वाद के अक्स
पेड़ों के तने केंचुल उतारने लगेंगे
घडि़यों में लौट रहा होगा
कच्ची शराब की गंध का वक्त

कविता में
पैदल चलते जहाज़ और पेड़
एक दिन जरूर उसी एक घर की नींव तक जा पहुँचेंगे
जो गेहूँ, सूत और मल्लाहों के वापस आने की
आत्मीय प्रतीक्षा पर टिकी है

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