किताबें

खोल देती हैं वे हम में सदियों से बंद आँखें
उन से टपकने लगते हैं पछतावे
अपने बहुत छोटे और मामूली होने के

पन्नों पर उगे रहते हैं पठार
दर्ज होते हैं एक से एक रोचक युग
वे ढहते हुए विराट् को थाम लेती हैं

कागज़ आसमान में तब्दील हो जाते हैं

वे ले जाती हैं उँगली थाम कर बस्तियों और बीहड़ों के पार
झाडि़यों और सूर्यास्त के दृश्यों से दूर
परास्त सभ्यताएँ उनमें खड़ी हो रही होती हैं पेड़ों की तरह

वे हमारे भीतर चिडि़यों की तरह घोंसले बनाती हैं
फिर उनमें से निकल आते हैं कुछ दृश्य
और पानी की शक्ल धर कर तालाबों पर उग आते हैं
वे ऊदबिलावों की समाप्तप्राय नस्लों को ले कर डूब सकती हैं चिंता में
उनमें गूँज सकती हैं असंख्य अजानें मंदिर के घंटे घडि़याल प्रार्थनाएँ
उनमें वृहस्पति की धरती के खनिज हो सकते हैं
या एक निरपराध स्त्री का मर्मबेधी रुदन
वे निरपराध कटते हुए पेड़ों के लिए भेजती हैं शोक-संदेश
उत्तर का इन्तज़ार किए बिना उतर जाती हैं घाटों पर
जीवन की गहमागहमी से आसक्त
करोड़ों मील लम्बे रेगिस्तान में वे बरसात की तरह उदित होती हैं
वे हमें पढ़ती हैं जब हम उन्हें पढ़ने का ढोंग कर रहे होते हैं

कौन जाने शायद सिर्फ़ उन्हीं से
घौंसले नदी के तट स्मृतियाँ घर ईश्वर ग्रह
सुगन्ध सन्नाटें भूगोल जानकारियाँ भाषा तालाब
बचपन उत्सर्ग प्रेम और पेड़
संसार में जरूरी सामान की तरह हमारे भीतर बचे रह सकते हों ……

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