पुरानी चिट्ठियाँ

कोई एक पुरानी चिट्ठी

खोल देती है मुझ में अँधेरा बन्द तहख़ाना
एक संदूक जैसे खुला करता था काठ का विशालकाय
कभी बचपन में निकलते थे
जिसमें सर्दियाँ आने पर दस्ताने मफ़लर लबादे जर्सियाँ और कनटोप
पढ़ कर पुराने पत्र क्षणों में बरसों पीछे चला जाता हूँ
दोस्तों के साथ देखता हूँ खुद को पहाडि़यों पर निरुद्देश्य भटकता
ख़तों में मिल जाती हैं वे ही परिचित झाडि़याँ
हवा में कँपकँपाती सरकंडों की सरसराहट
पश्चिम की तरफ ढल रहे धूप के अक्स
हमारी साइकिलों का पीछा कर रहे होते हैं
दुबारा सुनता हूँ पत्रों में अपनी हमेशा सी खिन्न माँ की नसीहतें
कि कैसा होना चाहिए बहू-बेटियों को

हर बार लौट आती हैं चिट्ठियों में कविता भेजने के लिए
सम्पादकों की फ़र्माइशें
कभी अपने किसी पाठक की निर्बाध प्रशंसा पढ़ कर दोबारा फूल जाता हूँ
कभी पुराने पत्र ले जाते हैं सुदूर लोकों के सफर पर
और फिर से छोड़ आते हैं हमें जवानी के सिनेमाघरों में
जहाँ पहले से टिकट खरीद कर साथ पढ़ने वाली कुछ लड़कियाँ
हमारी बेसब्री से प्रतीक्षा करती मिलती हैं

पत्रों में घुले रहते हैं न जाने कितने
हर्ष शोक खेद उल्लास विषाद
प्यार धिक्कार उलाहने आग्रह
आशंकाएँ खुशियाँ भय
विरह अवसाद बहाने स्नेह और चिंताएँ
एक पुरानी चिट्ठी बीते हुए ज़माने के बरसों से बन्द तहखाने की चाबी है

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