नींद में मोहनजोदड़ो

पृथ्वी की विराट् करवट में दफन है एक समूचा शहर
अपने उत्कर्ष और सम्पन्नता की लक़दक़ से थक कर सोया हुआ
न जाने उसके बाजारों में ठसाठस भरे रहे हों
कैसे कैसे आभूषण अद्भुत वस्त्र खिलौने बर्तन
उसके जलाशयों में खिलें हों असंख्य कमल
सूर्योदय का इन्तज़ार करते हुए
सदियों तक रसोईघरों में पका हो सुवासित अन्न
काम से लौट कर आने वाले
क्लांत गृहस्वामियों के लिए घर की स्त्रियों ने बरसों लगाए हों
जूड़ों में फूल
अनगिनत शामें बच्चों ने बिताई हों उद्यानों में खेलते हुए

डूबता हूँ किसी अथाह समुद्र में
देखता जाता हूँ मैं कुछ चिर-परिचित दृश्य
पढ़ता हूँ नींद में कोई अज्ञात चित्रलिपि
पर अंततः धरती के भीतर से बरामद होते हैं
केवल निस्तब्ध हम्माम उजाड़ राजमार्ग
निर्जन नाट्यगृह
घरों के सूने चैक जानवरों से खाली चारागाह

मैं जानता हूँ
शताब्दियों बाद भी दुनिया में सब कुछ एक-सा रहता है
सिवाय समय के

हमारे निकट रह जाती है
हर बार सिर्फ अवशेषों से भरी धरती- मृत्यु जैसी शांत और भव्य

किन्तु हर बार नींद खुलने पर पूरी पृथ्वी पर
सिर्फ मैं ही क्यों होता हूँ शोकग्रस्त और व्यथित

क्यों नहीं हो पाता काल जैसा अगम्य अनादि अचल
नहीं बन पाता क्यों
शानदार सभ्यताओं की दारुण पराजय का स्थितप्रज्ञ गवाह!

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