एक पर्व है घर

हर सुबह खुल जाता है घर एक छाते की तरह निःशब्द

थकी-माँदी सीढि़यों पर हमेशा इंतज़ार में मिलते हैं अखबार
दूध की बोतलों का जीवन वहीं से शुरू होता है
रसोई से उठती हैं पकते हुए अन्न की पदचापें
वस्त्रों से छिपी रहती हैं यादें
न जाने कैसे धूल आलों और अलमारियों में जम जाती है
दुनिया भर की झाड़-पोंछ के बावजूद
पर्दों के साथ हिलते हैं खिड़की पर ठहरे वर्ष
फ्रेमों में पुरानी तस्वीरें ऊँघती हैं
बर्तनों की खटर-पटर से टूट जाती है मुँह अँधेरे
घर की नींद
छज्जों पर कोई बेआवाज़ उग आती है
जैसे मुँडेर पर उम्मीदें
बरामदों से प्रतीक्षाएँ
और कमरों में घटनाएँ

बिस्तरों पर लेटी रहती है फुर्सतें
आरामकुर्सियों पर अलसाती है निश्चितताएँ
दोपहर की धूप में तय की जाती है
शाम की रसोई
स्वेटरों के लिए डिजाइन
वहीं पढ़ी जाती है चिट्ठियाँ और व्यंजनों की विधियाँ
छत पर अक्सर सुखाए जाते हैं पापड़ और अचार
हर रात जब सारे घर पर नींद का नशा छा जाता है
बेखटके घूमते हैं चूहे
तश्तरियों में
उनके प्रीतिभोज के लिए बहुत कुछ छोड़ा गया होता है

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