भीतर

भीतर

देख रे प्राणी, अंदर देख
अंधेर है भीतर , फिरसे देख
क्यूँ कोस रहा है देश परदेश
तुने ही तो लिखा अपना लेख

जहाँ पे तो लाली छाई है
सूरज की किरने आई है
रात अँधेरी है अंदर,
द्वेश तो तेरा अपना है

शायद है रावण, राम भी तो है
डूबने वाले, नाव भी तो है
छोड़ उमीदे, ले ले भेख
फिरसे लिखले तू अपना लेख

जनक देसाई

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