घर लौटना

कोहरे और ओस से भरे दिनों को
याद करता हूँ
जैसे मैं फिर लौटता हूँ घर
अकेला और निरुपाय
पीछे छोड़ कर अपना असबाब

बन्द हैं दरवाज़े और
चिडि़यों के चहचहाने की ध्वनि आ रही है
सीढि़यों को न जाने किसका इंतज़ार है

मुरझाती हुइ्र्र दूब और ज़मीन पर
गिरते हुए पत्तों पर चल कर मुझे कहीं पहुँचना था

याद करता हूँ बचपन के पहले
स्कूल की घंटी का स्वर
खुल जाते हैं मुझ में
पढ़ी जा चुकी किताबों के मुखपृष्ठ
एक अदृश्य हाथ मेरे कंधे छू लेता है
कपड़े वैसे ही तह किए मिलते हैं
घर लौटने पर
रसोई में उड़ रही होती है बासमती
चावल पकने की सुगंध जो धीमे-धीमे
सारे शहर को अपनी गिरत में ले लेती है

मुझे याद नहीं मैं कहाँ जाने के
लिए निकला था कहाँ तक आ गया

घर न जाने कैसा आश्चर्यलोक है
जहाँ से चलता हूँ
हर बात कविता में
बस वहीं लौट आता हूँ

बतलाएगा कौन
कि घर से जाने और
लौट कर घर आने के बीच
आखिर
मैं कहाँ होता हूँ ?

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