प्रेम और मृत्यु में

एक पड़ाव ऐसा है हर कविता में
जहाँ प्रेम और मृत्यु-
दोनों का एक ही मर्म है

अनन्त नीली रोशनी में डूबे हुए फूल
वहाँ खिले मिलते हैं आँख खुलने पर
आर्द्र बेचैनी छाई होती है हर कहीं
चुपचाप पिघल रहे होते हैं स्फटिक रंग

आकाश की ओर जाती हुई मौन प्रार्थनाएँ
बीच में ही थम जाती हैं
उन्हें रास्ते से भटकाने के लिए

बहुत-सी चीजें मिल जाती हैं मार्ग में
नए वस्त्र
देर तक रहने वाली खुशबुओं में भीगे पत्र
देह से बाहर निकल जाने की उम्र
और बेपनाह फुर्सतें

हम देखते हैं चेहरों पर छाई ऋतुओं की आभा
होठों पर जमा निस्मीम शांति का समुद्र
आँखों में ठसाठस भरे असमाप्त दृश्य
पैरों में लिपटी हुई दिशाएँ
और नींद की घाटियों के फूल

लगभग एक जैसे ध्वनिहीन विस्फोट से
शुरू होती हैं दोनों की चिंताएँ
और उपसंहार में सिवाय संस्मरणों के कुछ नहीं रहता शेष-
प्रेम और मृत्यु में !

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