अतीन्द्रिय

रोज इसी वक्त गुज़रती है यह रेलगाड़ी

याद आते हैं मुझे सिर्फ़ स्वप्न
कभी जो मैने देखे
वे क्रूरताएँ वे मोह वे परीक्षाएँ जो मैने पास कीं
हवा में खुल जाती हैं खिड़कियों की तरह
मैं कई वर्ष पीछे लौट जाता हूँ
उलाँघ कर वक़्त का प्लेटफाॅर्म
और खुद को किसी टिकटघर के सामने खड़ा पाता हूँ
न जाने कौन सी यात्रा है यह
कौन सा गंतव्य
सब कुछ अधलिखा और लिपिबद्ध खो जाता है
शोर में
एक मटमैली धुंध कंधो पर उतर आती है
कोहनी के तले अतीत
ज्यों कोई पढ़ा जा चुका अख़बार
ठोड़ी पर टिका हुआ इन्तजार
’सामान बांध लो, नज़दीक है घर’ कोई कह देता है।
पर कभी खत्म नहीं होता है सफ़र
हमेशा जो स्वप्न में शुरू होता है

यह रेलगाड़ी
रोज़ इसी वक़्त गुज़रती है!

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