एक सार्थक शुरूआत

लाखों प्रकाशवर्षों तक पैदल चल चुकने के बाद

जागता हूँ भाषा में अचानक

पहचान में आ जाते हैं ओस के बने बादल
बीजों को पेड़ हुए देखता हूँ
जहाँ एक अविचल पहाड़ उग रहा है बेआवाज़
बालियों के भीतर पक रहा है अन्न
करोड़ों मछलियों को जीवित रखे हुए है समुद्र
फूलों से लिपटती हुई तितलियाँ
तालाबों में कमल जहाँ तक सुन सकता हूँ
जड़ें पाताल तक पहुँच रही हैं
ब्रह्मांड के बग़ीचे में असंख्य नक्षत्र सेबों की तरह लटके हुए हैं

इस अप्रतिम पृथ्वी को एक मकड़ी की शक्ल में
देखने वाली हिंसक आँखों के लिए यहीं से एक छोटी
किन्तु, सार्थक शुरुआत हो सकती है

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