‘कुछ नहीं’ के बारे में कविता

अब से पहले मेरा मानना था-

‘कुछ नहीं’ के बारे में कुछ भी कह सकना एक झूठ है।
उस पर कविता भी नहीं की जा सकती अगर, ईमानदारी से उसे बनना पड़ जाये
इसका मतलब यह नहीं निकाला जा चाहिए कि कवि मक्कार होते हैं
तब ‘कुछ नहीं’ पर कैसे लिखी जा सकती है कविता ?
यही सब सोचता मैं था-दृश्य में, फिर, नहीं भी।
क्या मैं ही था वह ? क्या था वह दृश्य भी ?
अब याद आया-रविवार की एक सुबह थी।
निखिल विश्व-प्रपंच। बदस्तूर था उसका होना, न होना।
आकाश की जगह आकाश और रंगों की जगह रंग।
वृक्ष पहचाने जाने की हद तक पुरानी आकृति में थे
जब तक वे बिल्कुल अपरिचित न हो गये।
मकान पूर्ववत् ऐसे कि बरसातों से बचा जा सके। फिर वे भी अर्थ खो बैठे।
पास के पशुओं का दुःख नहीं जान सकती थी साइकिल
मैं बैठा था बैंच पर
रविवार की एक सुबह थी साइकिल पास थी बिना चले
और तभी लगा बिलकुल उसी पल
‘कुछ नहीं’ के बारे में भी लिखा जाना चाहिए
पर कैसे ? बहुत वक़्त लगा सोचने में और मुझे वापस अपने में लौटना पड़ा।

यों कहीं गया थोड़े ही था। जा कैसे सकता था भला ?
हजामत ने शायद कुछ वृद्धि-चिन्ह दर्शाये हों
और समय ? उसे तो निकलना था ही वह भी निकला ही होगा
अपने आप से माथापच्ची के बहुत देर बाद,
यह कविता रची गयी।

अब मैं बहुत खुश और सन्तुष्ट हूँ
एक दुःख के समापन पर

अब तो आप मानेंगे जीवन में कई-कई बार,
कवितारम्भ के लिए मरते हैं कवि
‘कुछ नहीं’ के बारे में कहने की खब्त में अभी-नहीं
जैसे मेरा पुनर्जन्म हुआ !

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