आत्मा की भूख है स्मृति

तुम्हें जीवित रखने के लिए भाषा एक लौ बन कर कौंधती है

लाखों साल से शिराओं में बहते हुए खून में

शब्द हिलता है पर, इसे गणित की तरह आसान मत समझ लेना
मैं होता हूँ अगर मैं कहूँ कि मैं हूँ
यहाँ कँपकँपाती हुई चट्टानों की कतारें हैं
जलपोत दृष्टि से ओझल होते जा रहे हैं
ज़हरीला समुद्र हमें मथ रहा है
नहीं जानता यह कौन चल रहा है सफ़र में मेरे साथ
सब-कुछ गड्ड-मड्ड और धुँधला है
सारा दृश्य जिस मोड़ पर आ कर एक विस्फोट में बदल जाना चाहता है
वहीं अचानक एक तितली अँधेरे को चीरती हुई दिखती है
उसके लाल-सुनहरे पंख मुझे अवाक् कर देते हैं
ताज्जुब है हजारों साल से मैं जिस चीज़ का पीछा कर रहा था
जानता ही न था आखि़र वह चीज़ है क्या

कैसा था वह चुम्बकीय आकर्षण
जो हम लोग भाषा में बँधे बेतहाशा उसके पीछे भागने लगते थे
समुद्रों का अन्त नहीं था और मुझे लौट कर घर आना ही पड़ा

प्रकटतः मैंने कविता में
आत्मा की ही चर्चा की
पर स्मृति की अदृश्य अनुपस्थिति के बिना
क्या उसकी कहानी पूरी होती

Leave a Reply