खिड़की में कबूतर

बैठा कबूतर एक खिड़की में मेरी

लगता जैसे चबा डालता
मेरे शब्द

जब-जब उगता दिन एक ध्वनिविहीन, रंगहीन, गन्धहीन बेस्वाद,
उसे लिखता मैं कविता में
कमरे में भर रही उड़ते अर्थों की गंध …

सूँघते हुए चले आते पेड़
इसी एक खिड़की तक
हर बार लगता है, जैसे वे निकल पडें़गे गन्ध के साथ

यात्रा पर पेड़ सफ़र पर कब निकलेंगे ?
कब ? आखि़र कब ??
पूछता हर बार उस कबूतर से मैं
कभी नहीं पाता हूँ प्रत्युत्तर,
चबा रहा मेरे शब्द
बैठा वह मेरी खिड़की में अब भी अविचल

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