मैं जो बन्‍दी हूं

मैं, जो बंदी हूं
गाता हूं आनन्दित-मुक्तिगीत:
मेरी बेडि़यां फुसफुसाती रहती हैं-
“तुम समग्र हो,
तुम हो स्‍वतन्‍त्र”
तुम्‍हारे बन्‍धन हैं
केवल तुम्‍हारे बन्‍धुओं के
मुक्ति-प्रतीक !”

और…
तुम जो आबद्ध/स्‍वेच्‍छाचारी हो
चीखते रहो अनवरत आशंका में-
“हमें उसको बनाए रखना है
बन्‍दी,
अन्‍यथा हम मर जाएंगे।”

Leave a Reply