ये क्यूँ इस कदर ……………….याद करता हूँ

ये क्यूँ इस कदर ……………….
जेठ कि चुभती दोपहर में
भटकता
बरसात से पहले
अंधड तूफ़ान में आंखे मलता
घनघोर वृष्टि कडकडाती धारा में
भय से कपकपाता
जाड़े की शीतलहर में
शारीर सिकोड़े
सावन के इंतज़ार में
उस पल को
जब देखा था तुझको
इस एहसास से पहली बार
उस परिदृश्य में
पुष्प सुंगंध बिखेरे, पक्षी कलरव करते
तरुवर कि छाया में
गर्दन झुकाए, लट लटकाए
कुछ गुनगुनाते हुए …………उस पल को मैं याद करता हूँ |

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