दाम्पत्य-चार कविताएं

दाम्पत्य-चार कविताएं

1

अगर तुम चाहो बह सकती हो पानी में

तरलता की तरह

रह सकती हो हवा में आक्सीजन

जैसे रहती है नमक में स्वाद और पत्थर में कठोरता

यह असम्भव है

तुम न चाहो कुछ भी होना

(वह हम ईश्वर के लिए छोड़ दें)

घर के आलों में

हमारी इच्छाओं की बहुत-सी शक्लें हैं जैसे

वस्त्रों को देख कर हताशा……।

बीतना समय का दुर्गुण है और

पवित्रता एक अगरबत्ती जिसके सहारे जलता हुआ

यह बिस्तर महक रहा है

बदली हुई सूरतें हैं शीशे में

विद्रूप, आतंक, ख़ुशियाँ हैं, कुछ यात्राएँ, विरह,

क्या यह प्रेम नहीं है ?

रोना, जागना, और देखना …….

अब जैसा भी है यह जीवन

हमारा है

….फिर जैसा तुम चाहो

2

आँसुओं से शुरू होगा जो शीतयुद्ध

पछतावे पर ख़त्म होगा

उसकी आँच में पिघलते हुए हम

कैसे शुरू करेंगे अपनी अगली सुबह ?

दिनचर्या में शरीक होंगी कौन-सी प्राथमिकताएं ?

चाय के प्याले में घुला होगा फिर कौन-सा संकल्प ?

लेटी होंगी छोटी-मोटी फ़रमाइशें बिछौने पर

ऊबते हुए पुराने तकियों को

सुखी दाम्पत्य में तब्दील करतीं

बर्तनों के खड़कने की आवाज़ का मायना होगा

क्षण भर को वह भूल गयी है हमारे बीच घटित हुआ

एक दुःस्वप्न

घूप होगी उसकी हँसी

और आत्मा का गुमसुम सूरजमुखी तब

बेआवाज

खोल लेगा अपनी पंखुडि़याँ

3

प्रिये

तुम्हारी छाती पर उगे सेबों पर मेरे होंठ

और

देह

के पठारों पर

स्तम्भन की पुरानी घास

अभी-अभी सम्पन्न

मैथुन की नमी

से यह बिस्तर जाग गया है

तुम्हारे शरीर से बाहर

एक और खिड़की है

जिसका सूर्योदय देखने के लिए अभी-अभी

मैं तुम्हें चूमना चाहता था ……

4

हमारे कठिन से कठिन

कूटलेखों को भी

आसानी से पढ़ लेती हैं पत्नियाँ

उनके भीतर एक मशीन है काल्पनिक डरों का उत्पादन करती

कभी नहीं बीतती बैटरी और जिसके फलस्वरूप

आशंकाएँ उन्हें बराबर

घेरे रहती हैं, जिसे वे आजीवन

सच समझती हैं, महज़

गल्प होते हैं-

कुछ पुरानी तस्वीरों, बर्तनों

कपड़ों और व्यंजन विधियों के सहारे

नहीं सझता जा सकता स्त्री का गणित।

अक्सर दुनिया भर के बेचारे पति

कुछ ख़ास-ख़ास मौक़ों पर बहानों की

गुप्त लिपियों को आविष्कार करते

इसे भूल जाते हैं।

और तब जो जो होता आया या हो सकता है,

वह विषय नहीं इस कविता का !

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