अगली सुबह

देख सका वहीं तक अपने सपनों की पीठ

वहीं तक पहुँची पक कर गिरने को उद्यत फलों की चीख़

भाषा में व्यथा एक बहुअर्थी शब्द है

वह था, तब भी वैसा ही

किस तरह धुँधला गये वस्त्रों के छापे

दिन अचानक कैसे डूबा

मैंने चाहा था हर शोक और अपनत्व में तुम्हें चूमूँ

रोशनी किसी पानी की याद दिलाती

वहाँ बराबर हिल रही थी

चाहता तो

लिख सकता था हथेली पर

अट्ठाईस बारह उन्नीस सौ बावन ई.

और खोयी हुई नावों की तलाश में जो असल में बरस थे

शहर से बहुत दूर निकल जाता

ज़मीन में जड़ें थीं पत्तियों को बराबर हरापन पहुँचाती हुईं

सिर्फ़ औरतें सुस्त दिख रही थीं बिस्तरों में

मुझे लगा

अन्त,

बिलकुल निकट है

इस बेगै़रत दुनिया का, बिल्कुल अन्त

आँखें खोलने पर अगली सुबह मैं हमेशा की तरह ग़लत साबित हुआ

इसे

और और

और

ज़्यादा

पसन्द

करता

हुआ

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