आँधी

किसी अनदेखी खोह से निकला आर्तनाद है वह

आसमान फोड़ कर पृथ्वी की तरफ़ बढ़ती एक किरकरी चीख़

सुनते हैं हम उस के आगमन पर

चिटकनियों की खाँसी

फड़फड़ाती हुई खिड़कियाँ

दिखते हैं पिघलते हुए दरवाज़े

लड्खड़ा कर ध्वस्त होते झाड़फानूस

ढँकते हुए अपने कान

और आँखें मींचते

हम  देखते हैं

क्षण भर में किसी जादू से

बदल गया अपने कपड़ों का रंग

जब गिर रहे होते हैं बाहर खम्भे

बदल जाती है क्षण भर में

चहकती हुई दुनिया

घुप्प नीले अंधकार में

अगले दिन छप रहे प्रभात संस्करण की पहली ख़बर बनने के लिए

उसके पंजे में दबा होता है

आतंक और भय से सीजती धरती का आयतकार टुकड़ा

जिसे भूगोल में शहर कहा जा सकता है

उँडेलती लगातार पीला रंग छज्जों और बरामदों पर

बरसों से स्थिर जड़ों को धराशाई करने की सफलता में

क्रूरतापूर्वक उखाड़ देती वह मच्छरदानियाँ

दीवारों के पलस्तर चैपड़ की महफि़लें

चैक में शान्तिपूर्वक सूखते हुए कपड़ों दरख़्तों को

मृत्यु की घाटी में खींच ले जाती

समाप्ति पर वह बन जाती है सिसकी नफ़रत लाचारी क्रोध हताशा हँसी

फिर

संस्मरण

हर आँधी के बाद ऐसे ही किसी संस्मरण से

हम फिर से शुरू करते हैं अपना जीवन

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