पृथ्वी को सम्बोधित

किसी अथाह के भीतर गिरती इच्छाओं के लिए

यहाँ तुम कुछ देर ठहरो प्यारी पृथ्वी

रुको कि तुम्हें दिखलायी दे हमारी भाषा

जिसमें पहन रहे हों हम कपड़े

वे दीप्तियाँ

जो इसके अर्थ में उपजें और

शब्दों के भेस में तुम्हारे निस्सीम तक पहुँच सकें

मिलेंगी तुम्हें

रास्ते में उदारताएँ

वाष्प से बने बादलों की शक्ल में नदियाँ

मिलेगा ख़ार नमक और किताबें

मिलेंगे लोग सागर-तटों पर शीर्षासन करते

हत्यारे भी मिलेंगे सन्त और कसाई भी

इतना कुछ मिलेगा कि सब कुछ गड्ड-मड्ड होता जान पड़ेगा

प्यारी पृथ्वी,

तुम्हें काम पर जाने की जल्दी न हो अगर

और तुम्हें सचमुच दिलचस्पी हो यह जानने में

कि तुम टिकी हो, तुम आखि़र किस केन्द्र पर

तो हमें भरोसा है

तुम सूँघ लोगी

फ़ौरन

सुबह-शाम चूल्हे पर सेकी जाती

गरमागरम सुनहरी रोटी की महक

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