मेरी मेज

पिछले बहुत बरसों के मेरे जीवन का है हिस्सा

और उसका बेहतरीन दुःख

जैसे मेरी अकेली शरणगाह मेरी मेज

आयताकार छाती पर जिसकी

पड़ी रह सकती हैं अनिश्चित काल तक बेढब बेतरतीब च़ीजें

जो बदल सकती हैं मुझे

एक निश्ंिचत और कभी-कभार ग़ैरजिम्मेदार आदमी की संज्ञा में

सब से ज़्यादा ढोती है यह कविताओं का बोझ

जिन्हें ले कर मैं

अकेला अक्सर बेहद परेशान और उदास होता हूँ

यही अकेली घर भर में जानती है

मेरे अपने दुःख अनगिनत

जिनकी फे़हरिश्त कभी नहीं बना सकेगी यह

पर  अपने सपनों और जागने में बराबर

जिनके लिए चिन्तित होती रहेगी

दराजों में इसके बन्द हैं कई रहस्य

अँधेरे में जैसे

छिपा हुआ तो कटा हुआ घायल वृक्ष

मैंने देखा है शुरू से चमकीला

इसका बचपन

अभी मैं देख रहा हूं इसकी कठिन युवावस्था

नहीं देख सकूँ शायद कभी इसका पतन इसका देहान्त

एक क़रीबी दोस्त की शक्ल में

अभी तो इसकी समूची आत्मीयता को घेरे

इस पर टिकी हुई हैं मेरी कुहनियाँ अधर से

और

किसी शिकायत या श्रद्धांजलि की तरह नहीं

धड़कते हुए एक प्रेमपत्र की तरह

यह छोटी-सी कविता

अभी इस पल

इसी की आत्मा पर लिख रहा हूं

Leave a Reply